संदेश

गीता सार

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गीता जी के अध्याय 10 श्लोक 2 में कहा है कि मेरी उत्पत्ति को कोई नहीं जानता। इससे सिद्ध है कि काल भी उत्पन्न हुआ है। इसलिए यह कहीं पर आकार में भी है। नहीं तो कृष्ण जी तो अर्जुन के सामने ही खड़े थे। वे तो कह ही नहीं सकते कि मैं अनादि, अजन्मा हूँ। अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि ‘अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ। अब सर्व लोकों को खाने के लिए प्रकट हुआ हूँ।‘  श्री कृष्ण जी तो पहले से ही अर्जुन के साथ थे। यदि कृष्ण जी बोल रहे होते तो यह नहीं कहते कि अब प्रवृत्त हुआ हूँ।

कबीर साहेब का प्रकट दिवस

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कबीर साहेब का प्रकट दिवसहोता है,जयंती नहीं! सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455) ज्येष्ठ मास शुद्धि पूर्णमासी को ब्रह्ममूहूर्त में अपने सत्यलोक से सशरीर आकर परमेश्वर कबीर बालक रूप बनाकर लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। पूर्ण परमात्मा का माँ के गर्भ से जन्म नहीं होता। आदरणीय गरीब दास जी ने भी अपनी वाणी के माध्यम से यह बताया है कि परमात्मा कबीर जी की कोई माता नही थी अर्थात उनका जन्म माँ के गर्भ से नही हुआ। गरीब,  अनंत कोटि ब्रह्मांड में, बंदीछोड़ कहाय।  सो तो एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय।।

वास्तविक धर्म का ज्ञान

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वास्तविक धर्म का ज्ञान कबीर परमेश्वर जी ने सभी धर्मों के लोगों को संदेश दिया कि सब मानव एक परमात्मा की संतान हैं। अज्ञानता वश हम अलग-अलग जाति धर्मों में बंट गये।  जीव हमारी जाति है,मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, आपस में सब भाई-भाई। आर्य जैनी और विश्‍नोई, एक प्रभु के बच्चे सोई।।

कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना

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कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना पंडित सर्वानंद ने अपनी माँ से कहा कि मैंने सभी ऋषियों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रख दो लेकिन उनकी माँ ने सर्वानंद से कहा कि पहले आप कबीर साहेब को शास्त्रार्थ में हरा दो तब आपका नाम सर्वाजीत रख दिया जाएगा। जब सर्वानंद कबीर साहेब के पास शास्त्रार्थ करने पहुँचे तो कबीर साहेब ने कहा कि आप तो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हैं मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता। तब सर्वानंद ने एक पत्र लिखा कि शास्त्रार्थ में सर्वानंद जीते और कबीर जी हार गए। उस पर कबीर साहेब जी से अंगूठा लगवा लिया। लेकिन जैसे ही सर्वानंद अपनी माँ के पास जाते तो अक्षर बदल कर कबीर जी जीते और पंडित सर्वानंद हार गए ये हो जाते। ये देखकर सर्वानंद आश्चर्य चकित हो गए और आखिर में हार मानकर सर्वानंद ने कबीर साहेब की शरण ग्रहण की।

महर्षि सर्वानन्द की माँ शारदा का रोग ठीक करना

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महर्षि सर्वानन्द की माँ शारदा का रोग ठीक करना एक सर्वानन्द नाम के महर्षि थे। उसकी आदरणीय माता श्रीमती शारदा देवी पाप कर्म फल से पीडि़त थी। उसने कबीर परमात्मा से उपदेश प्राप्त किया तथा उसी दिन कष्ट मुक्त हो गई।  क्योंकि पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32 में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्रु (असि) है। फिर इसी पवित्र यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है।

मानव समाज सुखी कैसे बने

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आज का वर्तमान समय बहुत ही दर्द भरा है सभी के सामने बेरोजगारी वह बुक मरी है किसी के पास कोई रोजगार नहीं है अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय बहुत संकट भरा हो सकता है क्या इस संकट से ऊभर सकते हैं क्या हमारी जीवन चर्या पहले की तरह चल सकती है भारत वर्ष के अंदर बहुत सारी संस्थाएं चल रही है परंतु इन संस्थाओं के अंदर कोई नशा रहित नहीं है कोई भी दहेज रहित नहीं है केवल संत रामपाल जी महाराज जी   के अनुयायी ही दहेज रहित नशा रहित मिलेंगे और वह एक अच्छा समाज बने जिसके अंदर कोई बुराइयां नहीं हो सभी मिलकर यही प्रयास कर रहे हैं  आज के समय में यही संस्था समाज सुधारक संस्था है हमारा जीवन एक खुशहाल जीवन रहे हम सभी बुराइयों से दूर हो और सुखी जीवन जिए किसी के सामने कोई भी समस्या ना हो इन सभी के समाधान के लिए देखें साधना टीवी रात्रि 7:30 से

मानव समाज सुखी केसे हो

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 जब तक सच्चे सतगुरु के सत्संग के विचार सुनने को नहीं मिलते तो भूलवश मानव अहंकार में जीता है। सच्चे सतगुरु के सत्संग से पता चलता है कि परमात्मा अहंकार से कोसों दूर है। और इस मनुष्य शरीर का सदुपयोग कैसे करना चाहिए ये भी सत्संग में ही पता चलता है।